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Break Bloody Taboo Fundriser

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Break Bloody Taboo Fundriser    Event start date : 10/02/2018
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FAQ

Ans) माहवारी या पीरियड 9 से 16 साल के बीच में कभी भी हो तो वह नॉर्मल है लेकिन, 9 साल से पहले होना या 16 साल पूरा होने पर भी ना होना, असामान्य है और इसके लिए डॉक्टर से मिले और उनकी राय लें।
Ans) पीरियड या माहवारी चक्र 21 से 35 दिनों का होता है। शुरूवाती दिनों में यह 45 दिनों का भी हो सकता है।
Ans) पीरियड का पहले दिन (जिस दिन खून गिरना शुरू हुआ) से गिनती शुरू करते हुए अगले पीरियड के पहले दिन के बीच का अन्तर माहवारी चक्र कहलाता है। उदाहरण के लिए यदि मुझे 2 अप्रैल को खून गिरना शुरू हुआ हो और 6 अप्रैल को बंद हुआ हो और अगला पीरियड मुझे 25 अप्रैल को हुआ तो 2 अप्रैल से 25 अप्रैल के बीच का अन्तर यानि माहवारी चक्र 23 दिन का है। क्योंकि 23 दिन 21 से 35 दिन के बीच में आते हैं इसलिए यदि मुझे एक महीने में दो बार ब्लिडिंग हो रही हो तो भी यह सामान्य है। इसी तरह अगर किसी को माहवारी चक्र 33 दिन को है तो हो सकता है की उसे किसी महीने में पीरियड्स आए ही नहीं, पर वह भी नॉर्मल है। उदाहरण के लिए यदि मुझे 28 अप्रैल को पीरियड्स हुए और अगले पीरियड्स 1 जून को हुए (मई में नहीं हुए) तो मेरा माहवारी चक्र 33 दिन को है और यह भी नार्मल है।
Ans) अगर आपको हर घंटे पैड बदलना पड़ रहा हो या उसमें खून के थक्के (BLOOD CLOTS) बहुत ज्यादा हैं, तो यह बहुत ज्यादा ब्लिडिंग है और इस स्थिति में तुरन्त डॉक्टर से मिले चाहे यह पहला दिन ही क्यों ना हो। सामान्यत: 30 से 50 मिली. खून पूरे पीरियड्स के दौरान निकलता है। अगर यह 80 मिली के ज्यादा निकलता है तो डॉक्टर से मिलने की जरूरत है।
Ans) एक साफ पैड लें और एक कटोरी में पानी लें। अब घर में इस्तेमाल होने वाली एक चम्मच से पानी पैड पर डालें और देखें की आप इतना गीला होने पर पैड बदलती है? अगर नहीं तो एक और चम्मच पानी डालें। एक चम्मच में लगभग 5 मिली पानी आता है। इस हिसाब से आप पता लगा सकती है की कितना गीला होने पर आप पैड बदलती हैं और पूरे पीरियड्स के दौरान आपने कितने गीले और कितने पैड आपने बदले हैं।
Ans) पीरियड्स में 2 से 8 दिन के बीच कितने भी दिन ब्लिडिंग होना सामान्य है। सामान्यत: ब्लिडिंग शुरू के दिनों से ज्यादा होती है और धीरे धीरे कम होती जाती है और अन्त के दिनों में नाममात्र ( SPOTING) ही रह जाती है। अगर 4 दिन के बाद भी ब्लिडिंग ज्यादा हो रही हो तो डॉक्टर से जरूर मिलें।
Ans) जैसा कि ऊपर बताया गया है कि झिल्ली और खून के मिश्रण को ही पीरियड्स कहते हैं। यदि अंडा बच्चे में बदला होता तो इसी झिल्ली में दबकर और इसी खून के द्वारा बड़ा होता, जैसे मैं और आप हुए होंगे। इसलिए यह गंदा तो हो ही नहीं सकता क्योंकि इसके द्वारा ही एक नई जिन्दगी पनपती है। और ये वैसी ही साफ है जैसा किसी चोट लगने पर निकलने वाला खून।
Ans) हाँ, पीरियड्स के दर्द में दवाई ली जा सकती है। आज भी बहुत से घरों में यह मान्यता है कि पीरियड्स में दवाई लेने से बाद में बच्चा ठहरने में मुश्किल आ सकती है। पर यह सिर्फ एक मिथ्य है। बहुत ज्यादा दर्द होने पर कभी-कभी दवाई लेने में कोई नुकसान नहीं है। पर इसके लिए कोई भी दवाई अपनी मर्जी से ना लें बल्कि अपने डॉक्टर से पूछ कर कोई अच्छी दवाई ही लें।
Ans) सफेद पानी (white discharge) या ल्यूकोरिया कोई बीमारी नहीं है। यौनी (Vagina) और गर्भाश्य के मुख (cervix) में मौजूद ग्लैंड्स एक तरल बनती हैं, जो डिस्चार्ज के रूप में बाहर आता है ये डिस्चार्ज मृत कोशिकाओं व बैक्टीरिया को शरीर से बाहर निकालने का काम करता है, जिससे गर्भाश्य सुरक्षित रहता हैं। सामान्यतः डिस्चार्ज का रंग पानी के जैसा से लेकर दुधिया होता है व उसमें कोई गंध नहीं होती है।  लेकिन अगर इस डिस्चार्ज के साथ खुजली, जलन, बदबु, या डिस्चार्ज का रंग भूरा, हरा या गुलाबी हो, तो आपको तुरंत डॉक्टर से मिले क्योंकि ये इन्फेक्शन हो सकता है। आमतौर पर डिस्चार्ज प्रति दिन एक से दो चम्मच जितना होता है। अगर डिस्चार्ज बहुत ज्यादा हो और आपको इसके लिए पैड इस्तेमाल करना पड़े तो भी डॉक्टर से मिलें।
Ans) सामान्यत: रेशेस सिर्फ पीरियड्स के समय ही नहीं होते पर पीरियड्स के समय इसके होने की संभावना ज्यादा होती है। क्योंकि पीरियड्स के समय कपड़ें या पैंड के गीलेपन के रेशेस बढ़ जाते है और कभी-कभी चलना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में सिर्फ दो बातों का ध्यान रखें – साफ और सूखा। पैड की नियमित 4 से 6 घंटे में बदलें और पैंटी (कच्छी) अगर गीली हो तो उसी भी बार-बार बदलें। अंतिम दिनों में जब ब्लीडिंग बहुत कम होती है, तब भी पैंड 6 से 8 घंटे में जरूर बदलें भलें ही पैंड गंदा ना हुआ हो। साथ ही पैंटी को हमेशा साफ सुथरा रखें और धूप में ही सुखाएं। अगर रेशेस हो गये हो तो शुरूआती समय पर नारियल का तेल या वैसलीन लगाने से इसे कम किया जा सकता है। रेशेस कम करने के लिए मार्केट में कई उत्पाद भी मिलने लगे है जिनका प्रयोग डॉक्टर की सलाह से कर इन्हें रोका जा सकता है।
Ans) पीरियड्स के समय साफ-सफाई का ध्यान रखना सबसे जरूरी है। इसके लिए – 1. साफ कपड़ा या पैड इस्तेमाल करें 2. 4-6 घंटे में पैड या कपड़ा जरूर बदलें। 3. इस्तेमाल किए गए पैड या कपड़े को हमेशा पुराने अखबार में लपेट कर ही डस्टबिन में फैंके क्योंकि खून में बैक्टिरिया सबसे ज्यादा पनपते हैं और वातावरण में इन्फैक्शन फैलाते हैं। अगर हम पैड को खुला छोड़ेगें तो हम इन्फैक्शन को बढ़ावा देते हैं जो आज नहीं तो कल हमें भी बीमार कर सकता है। 4. अगर कपड़ा दुबारा इस्तेमाल करना हो तो उसे हमेशा अच्छे से धोकर धूप में ही सुखाए जिससे कि उसमें पैदा हुए बैक्टिरिया खत्म हो सकें। 5. अपने बैग में एक पोलिथीन में ये चार वस्तुएं हमेशा रखें। 1. पैड 2. पैन्टी 3 पुराना अखबार 4 पेपर सोप। इससे आप हमेशा आने वाले पीरियड के लिए तैयार और डर मुक्त रहेंगे।
Ans) लड़कियां लड़कों से अलग है क्योंकि लड़कियों में प्रजनन की क्षमता है, ये जन्म दे सकती हैं। इसके लिए लड़कियों को एक अलग अंग भी दिया गया है जिसे बच्चेदानी या गर्भाश्य (UTERUS) कहा जाता है। जब कोई भी लड़की पैदा होती है उस समय भी यह अंग उसके शरीर में विद्यमान होता है। गर्भाश्य के दोनों तरफ एक-एक ट्यूब लगी होती है जिसे अंडवाहिनी या फ्लोपियन ट्यूब (FELLOPIAN TUBE) कहते हैं। ट्यूब और गर्भाश्य के बीच दोनों तरफ अंडाश्य होता हैं (जैसा नीचे चित्र में दिखाया गया है) यह अंडाश्य अंडों का बैंक जैसा है जिसमें जन्म के समय दोनों तरफ मिलाकर लगभग 20 लाख अंडें होते हैं। इस बैंक का अकाउंट या खाता तब खुलता है जब लड़की किशोरावस्था में प्रवेश करती है। इस समय शरीर में बहुत सारे बदलाव हो रहे होते हैं। उसी समय अंडाश्य से हर महीने एक अंडा परिपक्व होकर बाहर निकलता है। एक बार दायीं तरफ से और एक बार बायीं तरफ से। अंडाश्य से निकलने वाला हर अंडा इस उम्मीद से बाहर निकलता है कि जैसे ही वह शुक्राणु के सम्पर्क में आएगा वह बच्चे में बदल जाएगा जो गर्भाश्य में विकसित होता है। मगर हर अंडा बच्चे में नही बदल सकता जब तक की वह शुक्राणु के सम्पर्क में ना आए जो कि शुक्राणु पुरुष के शरीर में होते हैं। मगर अंडा व गर्भाश्य यह बात पहले से नही जानते कि कौन सा अंडा बच्चे में बदलेगा। वह हर बार तैयार रहते हैं। जैसे ही अंडा अंडाश्य से बाहर निकलता है अंडवाहिनी उस अंडे को पकड़ कर गर्भाश्य की ओर ले जाती है। इसी समय गर्भाश्य की झिल्ली मोटी होने लगती है ताकि जब यह अंडा शुक्राणु से मिलने के बाद गर्भाश्य में पहुंचे तो उसे बच्चे के रूप में विकसित होने के लिए खून व उसमें मिले हुए तत्व इस झिल्ली के द्वारा आसानी से मिल सकें। मगर जब यह अंडा शुक्राणु से नहीं मिलता तो यह बच्चे में नहीं बदलता और यह झिल्ली उसे अपने अंदर नहीं लेती। अंडा निकलने के बाद यह झिल्ली 14 दिन तक इस अंडे को बच्चे में बदलने का इन्तजार करती है और जब यह बच्चे में नहीं बदलता तो झिल्ली गर्भाश्य से छूट कर बाहर निकल जाती है जिसके साथ खून भी निकलता है क्योंकि अगली बार दूसरी तरफ से निकलने वाले अंडे के लिए इसे फिर से तैयार होना है। हर महीने गर्भाश्य से निकलने वाली झिल्ली और खून का यह मिश्रण पीरियड के रूप में हमें दिखाई देता है।

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